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रीवा जिले के निराश्रित गौवंश की संख्या लगभग एक लाख है, जो जिले के कृषकों के लिए सदैव बड़ी समस्या रही है। इसी के साथ गौवंश एवं मनुष्य दोनों सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होते रहे हैं।
निराश्रित गौवंश के लिए सुविधायुक्त आवास व्यवस्था एवं उन्हें उपयोगी बनाने के उद्देश्य से "बसामन मामा गौवंश वन्य विहार पूर्व" की परिकल्पना की गई। इस वन्य विहार का मूल सिद्धांत है — "गाय का भोजन वन से, वन का भोजन गाय से" — अर्थात् गौशाला में रहने वाले पशु अपनी आहार व्यवस्था का 60–70 प्रतिशत भाग स्वयं जंगल में चरकर पूर्ण करते हैं।
20.437 हेक्टेयर भूमि में 2 गौवंश शेड तथा एक भूसा शेड के साथ 25 निराश्रित गौवंशों को आश्रय देकर वन्य विहार की स्थापना की गई।
परियोजना प्रारंभ के पूर्व मान. उपमुख्यमंत्री जी द्वारा जन सहयोग से ₹3 करोड़ एकत्र कर एफ.डी. की गई, जिसके ब्याज से कर्मचारियों के नियमित पारिश्रमिक की व्यवस्था सुनिश्चित की गई।
अधोसंरचना विकास हेतु मनरेगा द्वारा 14 गौवंश शेडों का निर्माण किया गया।
स्वच्छ भारत मिशन (गोवर्धन योजना) के तहत 85 क्यूबिक मीटर बायो गैस संयंत्र का निर्माण किया गया।
जिला खनिज गौण निधि से स्वीकृत प्रोम इकाई एवं पशु चिकित्सालय की स्थापना की गई।
गौशाला परिसर में मियावाकी तकनीकी द्वारा 8000 पौधों का वृक्षारोपण एवं वर्मी कम्पोस्ट शेड का निर्माण किया गया।
जनभागीदारी से गौशाला में रेस्ट हाउस एवं यज्ञशाला का निर्माण किया गया, जो धार्मिक अनुष्ठानों हेतु उपयोग में लाई जाती है।
वर्तमान में गौशाला में 8000 से अधिक निराश्रित गौवंश आश्रय पा रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय सहभागिता से यह अल्प समय में ही प्रदेश की प्रतिष्ठित गौशाला बन चुकी है।
गौशाला के सफल संचालन एवं विकास कार्यों में माननीय उप मुख्यमंत्री जी की सक्रिय सहभागिता एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है।
गौशाला की गतिविधियों एवं गौवंश की सेवा व्यवस्था का अवलोकन करने माननीय गृह मंत्री जी पधारे।
PMFME योजना अंतर्गत ₹2.00 करोड़ लागत का पशु आहार संयंत्र प्रस्तावित, जिसमें ₹35 लाख तक अनुदान प्रावधानित है।
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत ₹1.00 करोड़ लागत की साइलेज इकाई प्रस्तावित, ₹50 लाख तक अनुदान प्रावधानित।
गोबर से निर्मित पर्यावरण-अनुकूल कॉटेज पर्यटकों के ठहरने हेतु प्रस्तावित, जो आकर्षण का केंद्र बनेंगे।