लगभग 51 एकड़ भूमि में स्थापित, 10,000 गौवंश की क्षमता वाली यह गौशाला वर्तमान में 8,000 से अधिक निराश्रित गौवंश को आश्रय, चारा, चिकित्सा एवं सम्मानजनक जीवन प्रदान कर रही है। "गाय का भोजन वन से, वन का भोजन गाय से" — इसी सिद्धांत पर आधारित आत्मनिर्भर वन्य विहार।
रीवा जिले में निराश्रित गौवंश की संख्या लगभग एक लाख है, जो किसानों के लिए सदैव एक बड़ी समस्या रही है तथा गौवंश एवं मनुष्य दोनों को सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होना पड़ता है। इसी समस्या के समाधान हेतु दिनांक 17 जुलाई 2018 को मात्र 25 निराश्रित गौवंशों के आश्रय से इस वन्य विहार की स्थापना की गई, जो आज प्रदेश की एक आदर्श व प्रतिष्ठित गौशाला के रूप में स्थापित हो चुकी है।
14+ पक्के गौवंश शेड, भूसा भंडारण एवं संपूर्ण अधोसंरचना के साथ सम्मानजनक आवास।
गोबर आधारित जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट एवं मियावाकी पद्धति से 8000 वृक्षारोपण।
स्वच्छ भारत मिशन (गोवर्धन योजना) अंतर्गत 85 क्यूबिक मीटर बायो गैस संयंत्र।
जिला खनिज गौण निधि से स्वीकृत प्रोम इकाई एवं पशु चिकित्सालय की स्थापना।
गौशाला में रहने वाले पशु अपनी आहार व्यवस्था का 60–70 प्रतिशत निर्भरता जंगल से चरकर पूर्ण करते हैं, और गौवंश से उत्पन्न गोबर वन को समृद्ध बनाने में सहायक होता है।
इस तरह पशु आहार व्यय भी न्यूनतम होता है और वन के वृक्षों को जैविक खाद भी उपलब्ध होती है।
5 एकड़ भूमि में चारा उत्पादन तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, जिससे गौशाला आत्मनिर्भर बन रही है।
400 महिला सदस्यों द्वारा जैविक खाद, अगरबत्ती, गोनाइल, गौअर्क जैसे गौ-उत्पादों का निर्माण एवं विपणन।
गौपूजन, यज्ञ, संस्कार व अन्य धार्मिक अनुष्ठानों हेतु जनभागीदारी से निर्मित पवित्र स्थल।
गौवंश के भरण-पोषण हेतु आपका छोटा सा योगदान भी अनेक निराश्रित गौवंश के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। धारा 80G के अंतर्गत सभी दान आयकर मुक्त हैं।